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मंगलवार, 6 अगस्त 2013

सूचना क्रांति

                                  सूचना क्रांति  
                                    भारत के संविधान मंे लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना की गई है, जिसमें जनता में से, जनता के द्वारा, जनता के लिए, चुने प्रतिनिधियों द्वारा राज्य किया जाता है । इस प्रकार जनता का राज्य होता है । ऐसे राज्य मंे प्रत्येक नागरिक, वर्ग, को वाक् एंव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है जिससे उसे यह जानने का अधिकार है कि उसके खून-पसीने की कमाई से एकत्र किये गये लोकधन का सरकार लोक प्राधिकारी, लोक संस्थाएं किस प्रकार उपयोग कर रही है। ऐसी सूचना की पारदर्शिता की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति सरकार से करता है । जो उसका मूल अधिकार है । इसी पारदर्शिता को लागू और प्रदर्शित करने के लिए सूचना अधिकार अधिनियम 2005 की स्थापना की गई है । जिसे आगे संक्षिप्त में आर.टी.आई. कानून या अधिनियम कहा गया है ।


 
                                        अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार होगा । सूचना के अधिकार को अधिनियम की धारा-2आई में परिभाषित किया गया है ।जिसके अनुसार सूचना का अधिकार से अभिप्रेत है। इस अधिनिमय के अधीन पहंुच योग्य सूचना का जो किसी लोक प्राधिकारी द्वारा या उसके नियंत्रणाधीन धारित है, अधिकार अभिप्रेत है । उसकी प्रमाणित प्रतिलिपि लेना, अभिलेखों की जाॅंच पड़ताल करना तथा आॅंकड़ों की प्रति प्राप्त करना भी सूचना प्राप्त करने के अधिकार में शामिल है।

                                              सूचना पाने का अधिकार अधि., 2005 सूचना की स्वतंत्रता अधि., 2002 के स्थान पर लाया गया है जो एक कमजोर तथा निष्प्रभावी कानून सिद्ध हुआ है.

 नए अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1 सभी नागरिकों को सूचना तक पहॅंच का अधिकार स्पष्टतया प्रदान करना।
2 सभी लोक अधिकारियों के लिए इस प्रकार की सूचना के प्रसार को एक बाध्यता बनाया जाना.
3 केन्द्र एवं राज्य स्तर पर एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र निकाय के रूप में सूचना आयोगों की स्थापना करना ।
4 सूचना आयोग सूचना प्राप्त करने के अधिकार को प्रोन्नत करेंगे तथा अधिनियम के प्रावधानों को लागू करेंगे. ये निकाय अपीलीय अधिकरण के रूप में कार्य करेंगे तथा इन्हें दीवानी न्यायालय के अधिकार प्राप्त होंगे।
5 अधिनियम में सूचना आयोग को ऐसी शक्तियाॅं प्रदान की गई हैं जो लोक अधिकारियों को सूचना देने से मना करने से हतोत्साहित करेंगी।

अधिनियम के अधिकार क्षेत्र में आने वाली विषय वस्तु 

 
1. केन्द्र एवं राज्य सरकारों के सभी मन्त्रालय तथा विभाग सुरक्षा एवं इंटेलीजेन्स संगठनों को छोड़कर।
2. पंचायती राज संस्थाएं तथा स्थानीय नगर निकाय।
3. सरकार से वित्तपोषित गैर-सरकारी संगठन।
4. केन्द्र एवं राज्य सरकारों के स्वामित्व वाले निगम तथा कंम्पनियाॅं

अधिनियम के विशेष प्रावधान

1. सूचना प्राप्त करने के लिए लिखित मे अनुरोध किया जाएगा । अनुरोध प्राप्ति के 30 दिन के भीतर ऐसी फीस संदाय किये जाने पर सूचना उपलब्ध कराई जाएगी ।
2. यदि जानकारी किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित है तो वह 48 घंटे के अंदर उपलब्ध कराई जायेगी ।
3. सूचना न दिये जाने के आदेश के विरूद्ध 30 दिन के अंदर अपील की जाएगी। दूसरी अपील 90 दिन के अंदर केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को दी जाएगी।
4. कानून के मुताबिक सूचना प्रदान करने में असफल रहने पर दण्ड का प्रावधान।
5. बिना किसी युक्तियुक्त कारण के सूचना न देने पर कोई आवेदन प्राप्त किये जाने पर निश्चित समय पर सूचना न दिये जाने पर असदभावना पूर्वक सूचना दिये जाने पर, जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दिये जाने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है ।
6. यदि उस सूचना को नष्ट कर दिया है, जो अनुरोध का विषय थी या किसी रीति से सूचना देने में बाधा डाली है तो वह ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जब तक आवेदन प्राप्त किया जाता है या सूचना दी जाती है, ऐसा करने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है ।
7. यह जुर्माने की रकम दो सौ पचास रूपये से पच्चीस हजार रूपये तक होगी ।
8. अधिनियम को अध्यारोही प्रभाव दिया गया है । अन्य न्यायालय की अधिकारिता वर्जित की गई है ।
9. आम व्यक्ति को लोकहित में सूचना का अधिकार प्रदान किया गया है । जो विषय वस्तु लोकहित से संबंधित है । वह सूचना के अधिकार में शामिल है ।
10. यदि किसी स्तर पर सूचना पाने के अधिकार अधिनियम-2005 तथा आॅफीशियल सीक्रेट्स अधिनियम, 1923 के प्रावधानों के बीच टकराव की स्थिति आती है, तो सूचना पाने के अधिकार अधिनियम-2005 के प्रावधानों को ही प्रमुखता प्राप्त होगी।

 
सूचना के अधिकार से लाभ

1. सूचना के अधिकार से आम जनता को यह लाभ प्राप्त है कि लोक प्राधिकारी जो कार्य करेंगे उसकी जानकारी रहेगी । यदि वह मनमाने तौर पर काम करते है तो उस पर रोक लगाई जा सकेगी ।
2. यदि लोक प्राधिकारी द्वारा सरकारी कार्य करने में हीला हवाला किया जाता है, वे कार्य में उपेक्षा बरतते है, जिससे शासकीय कार्य में मनमानी, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, भाई-भतीजावाद को बढावा देते है तो उन पर रोक लगाई जा सकेगी ।
3. आर.टी.आई एक्ट से यह भी लाभ है कि लोकहित के कार्यो की सुनवाई समय पर हो सकेगी ।
4. समुचित राहत आम नागरिकों को समय पर प्राप्त होगी।
5. सराकरी सेवको में कर्तव्य परायणता, जनसेवा की भावना जागृत होगी । जो इस अधिनियम का मूल्य उददेश्य है।
6. सूचना के अधिकार से देश को यह लाभ है कि लोक प्राधिकारी के कृत्यों में पारदर्शिता आएगी तथा नागरिकों के प्रति जवाबदेही बढेगी ।उचित ढंग से कार्य करने की भावना/मानसिकता विकसित होगी ।
7. देश को स्वच्छ प्रशासन सुशासन प्राप्त होगा ।
8. नागरिकों की सामान्य सुविधाए प्राप्त करने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करना पडेगा
9. लोकहित में मानक स्तर के कार्य होंगे ।
10. घटिया निर्माण कार्य पर रोक लगेगी ।
                                        इन्ही सब बातो को देखते हुए सूचना का अधिकार ’’सुशासन की कुंजी’’ माना गया है परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि सरकारी रिकार्ड चुस्त दुरूस्त सूची बद्ध कम्प्यूटरीकृत रखे जावे।
                                         आजादी के 58 वर्षों बाद विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में सूचना का अधिकार कानून निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेही और पारदर्शी बनाने के लिए लाया गया और इसने 8 वर्षों में जो लोकप्रियता हासिल की है, संभवतः वह किसी अन्य कानून ने हासिल नहीं की है। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॅानिक मीडिया में इस कानून के उपयोग के बाद निकलने वाली जानकारियों ने भ्रष्टाचार करने वाले देशद्रोहियों को बेनकाब किया है। 
 
                                          आर.टी.आई. कानून लागू होने के बाद सरकारी विभागों से मांगी जा रही सूचनाओं के कारण अनेक घोटालों का पर्दाफास हुआ है। घोटालो में फसने वाले नेताओं और अफसरों की नींद हराम हुई है । इस कानून ने भ्रष्ट नेता और अफसरों की नाक में दम कर रखा है । राष्ट्रपति भवन में बहुमूल्य गिफ्टों की अव्यवस्थित प्रबंधन की बात हो, स्पैक्ट्रम घोटाला, काॅनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोल ब्लाॅक घोटाला, सब जगह सूचना का अधिकार ने अपने उद्देश्य को सार्थक किया है।

                                                आर.टी.आई. की सूचना जुटाकर घोटालों का भंडफोड करने में अनेक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडा है । पुलिस प्रशासन द्वारा उन्हें समय-समय पर डराया धमकाया, सताया जाता है । ऐसी दशा में समाज के लिए काम करने वाले ऐसे आर.टी.आई. कार्यकताओं को सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए ।इसके लिए अधिनियम में संशोधन द्वारा दण्ड का प्रावधान अलग से जोडा जाना चाहिए । जिसके अनुसार यदि आर0टी0आई0 एक्ट के अंतर्गत सूचना मांगे जाने का डराया,धमकाया जाता है तो उस कार्य को अपराध घोषित कर दण्डित किया जाना चाहिए। 

 
                                                                     सूचना का अधिकार कानून जैसे-जैसे सशक्त बन कर उभर रहा है । वैसे-वैसे इसके विरोधियों की संख्या दिन पर दिन बढती जा रही है । जो इसे ब्लेकमेलिंग कर बता रहे हैं।राजनीतिक दल का आरोप है कि इस अधिकार का दुरूपयोग हो रहा है । इसके द्वारा सरकारी और राजनीतिक लोगो को जबरन परेशान किया जा रहा है । जबकि आर0टी0आई0 कार्यकर्ता इसे राजनीतिक साजिश और लोक अभिकर्ताओ का षडयंत्र बता रहे हैं । उनका कहना है कि सरकार की पोल खुलने के कारण इस अधिकार को कम करने और उसे जनता से छीनने का प्रयास किया जा रहा है । जो अब समय नहीं है क्यों कि सूचना के अधिकार को मान्नीय उच्चतम न्यायालय ने हमे मूल अधिकार घोषित कर दिया है ।

                                               सूचना के अधिकार के लिए कई लोगों की हत्या की गई है । लोगो को डराया धमकाया जाता है । लेकिन इससे सूचना के अधिकार की ज्वाला बुझने वाली नहीं है । इसने समाज में एक नयी रोशनी उम्मीद, आशा की किरण जगाई है । इसलिए जरूरत है कि ऐसे लोगों का साथ दिया जाये और प्रशासन पर दबाव बनाया जाये कि वह भ्रष्ट नेता, अफसरों, के प्रभाव में आकर ऐसा कोई काम न करे जिससे कानून मजाक बनकर रह जाये।

                                              केन्द्रीय सूचना आयुक्त नें एक महत्वपूर्ण फैसले में राजनीतिक दल को भी आर0टी0आई कानून के अंतर्गत शामिल कर लिया है । उनका अभिमत है कि राजनीतिक दल सरकार से सुविधाएं लेते है । सरकार उन्हें वित्तीय मदद देती है । इसलिए वह सार्वजनिक प्राधिकारी है । 

 
                                               सूचना के अधिकार को प्राइवेट संस्थाओ में भी लागू किया जाना चाहिए । प्राइवेट संस्थाओ लोकहित में कार्य करती है और उनके कार्य से लोकहित स्वास्थ, प्रभावित होते है। इसलिए यह आवश्यक है कि सभी प्राइवेट संस्थाओ जो कि लोकहित संबधी कार्य कर रही है उनमें भी अधिनियम के प्रावधान लागू किये जाये । 

 
                                 सूचना का अधिकार कानून की धारा 26 के तहत जनता को जागरूक करने की जिम्मेदारी सरकार की है, उसका कर्तव्य है कि इस कानून का प्रचार-प्रसार करें । इसके लिए उसे राज्य के स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए । 
 
                                                                    इसके अलावा प्रत्येक विभाग की वेबसाइड बनाकर सारी जानकारी प्रतिदिन उस पर अपलोड कर दी जानी चाहिए । ताकि सरकारी संस्थाओ पर सूचना दिये जाने का अतिरिक्त कार्य बोझ न बने । आज प्रत्येक सरकारी कार्यालय में सूचना देने के लिए अलग से विभाग और कर्मचारियों की आवश्यकता पड रही है । जिसे खुद सूचना सार्वजनिक कर इस कार्य को आसान बनाया जा सके । 

 
                                                               मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा अधिनियम की धारा- 27 के अंतर्गत सूचना अधिकार फीस और लागत या विनियमन नियम 2005 बनाया गया है । जिसके अंतर्गत 10 रूपये आवेदन के साथ फीस नगद मांग देय, ड्राफट या बैंकर चैक के रूप में लोक प्राधिकरण के लेखाधिकारी को संदेय किये जाने पर सूचना प्राप्त की जा सकती है ।

बचपन बचाओं आंदोलन विरूद्ध भारत संघ और ओ.आर.एस. संघ रिट याचिका सिविल नम्बर-75


    लापता बच्चों के सभी मामलों मेंएफ.आई.आर.केअनिवार्य        पंजीकरण के आदेश
-


                                         
                                                           माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा लापता बच्चों के संबंध में एफ0आई0आर0 पंजीकरण के साथ ही साथ प्रत्येक राज्य में विशेष किशोर पुलिस इकाई हर राज्य में विशेष रूप से स्थापित की जाने पर जोर दिया है। न्यायालय के निर्देशानुसार कम से कम पुलिस स्टेशन मंे तैनात एक अधिकारी को यह शक्ति दी जानी चाहिए कि वह विशेष किशोर पुसिल इकाई के रूप में कार्य करे। इस संबंध में राष्ट्र्ीय मानव अधिकार आयोग को सचेत किया गया है कि वह देखे कि इस संबंध में क्या कार्यवाही हो रही है। इससे राज्य में बच्चों के लापता या बच्चों की तस्करी कम होगी। 
 
                                                                

                                                                      प्रत्येक राज्य में किशोर न्यायालय अधिनियम-2000 की धारा-63 में किशोर न्याय नियम 2007 के अनुसार प्रत्येक राज्य में विशेष किशोर पुलिस इकाई की स्थापना नहीं की गयी जबकि सभी जिलों और सभी पुलिस थानों में पुलिस इकाईयों और किशोर बाल कल्याण अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य है और उन्हें राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के द्वारा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। 
 
                                              माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा लापता बच्चों के सभी मामलों में एफ.आई.आर. के अनिवार्य पंजीकरण के आदेश याचिका कर्ता बचपन बचाओं
आंदोलन विरूद्ध भारत संघ और ओ.आर.एस. संघ रिट याचिका सिविल नम्बर-75 वर्ष 2012 में पारित किये गये हैं जो निम्नलिखित हैंः-

1. इन सभी मामलों के संबंध में एफ.आई.आर. अनिवार्य रूप से रिकार्ड की जाये। 
 
2. राज्यों में विशेष किशोर पुलिस इकाई लापता बच्चों के संबंध में बनाई जाये।
3. ऐसे मामलों में एफ.आई.आर. दर्ज होते ही उचित कदम तुरंत उठाना चाहिए। 
 
4. ऐसे लापता बच्चों का एक डाटाबेट तैयार किया जावे।
5ण् ूूूण् जतंबा जीमउमेेपदह बीपसकण्हवअण्पद
ूूूण् बीपसकसपदमपदकपंण्वतहण्पद
ूूूण्ेजवच तंपिबापदहण्पद बच्चों से संबंधित इन तीनों वेबसाइट में जानकारी अपलोड की जाये।
6. प्रत्येक लापता बच्चों की फाइल व डाटा कम्प्यूटर में अपलोड किया जाना चाहिए
 ताकि इनके ट्रेंसिंग के प्रयास का उपयोग किया जाना चाहिए। 
 
7. सी.सी.टी.एन.एस. के माध्यम से खोया बचपन बेव साइट पर इसे शामिल करना 
चाहिए। 
 
8. डी0आई0जी0 रेंक के नीचे के अधिकारी को नोडल अधिकारी घोषित किया जाये।
9. वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मामले की जाॅच कर पर्यवेक्षण करेगी। 
 
10. लापता बच्चों की मासिक रिपोर्ट भेजी जानी चाहिये, ताकि उनका मिलान हो सके। 
 
11. बच्चों का आयोग भीख मांगने, ऊॅट जाकिंग, वैश्यावृत्ति प्रीडियोंफिलिप मेट जाॅच की जानी चाहिये। 
 
12. इसके लिये सी0आई0डी0 ग्राम पंचायत की सहायता ली जा सकती है।
13. सीमावर्ती स्थानों की चैकसी, रेल्वे स्टेशन, बस स्टेण्ड, सड़क मार्ग की नियमित चैंकिग की जा सकती है। 
 
14. 1099 टोल फ्री नम्बर की सहायता ली जा सकती है। निगरानी समिति हेल्पलाइन बनाई जा सकती। 

 
                             

सोमवार, 5 अगस्त 2013

‘ महिला भ्रूण हत्या ’’

                                                                    ‘ महिला भ्रूण हत्या ’’


            ‘‘गर्भपात’’ से आशय है स्त्री के गर्भ में स्थित भ्रूण, जो 20 सप्ताह से कम अवधि तक का (पर्याप्त रूप से विकसित) है, को चिकित्सीय आधार के बिना विनष्ट किया जाना । माॅं की किसी शारीरिक या मानसिक बीमारी के कारण अथवा गर्भस्थ शिशु की किसी बीमारी, अनुवांशिक असामान्यता आदि संभाव्य होने पर चिकित्सीय परामर्श से गर्भपात कराया जाना अनुमत किया गया है, किंतु लिंग चयन आदि के संबंध में अवैध रूप से कराया गया गर्भपात विधि की दृष्टि में दण्डनीय  अपराध है ।


                                                  महिला भ्रूण हत्या के संदर्भ में देखे जाने पर भारत में आरंभ से प्रमुखतः पितृ सत्तात्मक व्यवस्था रही है, जिसमें पुरूष को वंश वृद्धि का कारक मानकर वरीयता दिये जाने से महिलाओं की स्थिति दयनीय रही है । कालांतर में इस सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप दिन-प्रतिदिन विकृत होने से कन्या शिशु का जन्म अभिशाप माना जाने लगा, जिसके परिणामस्वरूप कन्या शिशु के जन्म होते ही उसे मार दिया जाता था । वर्तमान में तकनीकों के विकास के पश्चात् से गर्भावस्था के आरंभ में ही भ्रूण परीक्षण कर बड़ी संख्या में कन्या भू्रण को गर्भपात की विभिन्न तकनीकों से समाप्त किया जाने लगा, जिससे कन्या जन्म दर में भारी कमी होने से लिंगानुपात में पुरूष की अपेक्षा महिलाओं की संख्या अत्यधिक कम होती गई ।

                                                     सन्- 1971 में ‘‘गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन अधिनियम’’ विनियमित किया गया । इसके अंतर्गत केवल पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायियों को निर्धारित शर्तोंं पर उल्लिखित परिस्थितियों में गर्भ समापन किया जाना अनुमत किया गया है । विशिष्ट परिस्थितियों में यदि गर्भवती महिला के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में गंभीर क्षति होना संभावित हो अथवा गर्भस्थ शिशु के पैदा होने पर उसका गंभीर शारीरिक एवं मानसिक असामान्यता या विकलांगता से पीडि़त होना संभाव्य हो, तब गर्भवती स्त्री अथवा उसके संरक्षक अथवा पति की अनुमति से शासकीय चिकित्सालय अथवा इस प्रयोजन हेतु शासन द्वारा अनुमोदित चिकित्सालय में गर्भ का समापन कराया जा सकता है । इस हेतु 12 सप्ताह तक के गर्भ के लिये एक पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी एवं 12 से 20 सप्ताह की अवधि के गर्भ के लिये दो पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायियों की इस हेतु राय आवश्यक है । यदि अधिनियम के उल्लंघन में रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा गर्भ समापन किया गया हो अथवा अनुमत स्थान से भिन्न स्थान में गर्भ समापन किया गया हो तो उसे दो वर्ष से सात वर्ष तक के कठोर कारावास से दंडित किया जा सकता है । इस अधिनियम के अंतर्गत बनाये गये विनियमों का जानबूझकर उल्लंघन किये जाने पर एक हजार रूपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है, किंतु रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा सद्भावपूर्ण की गई किसी कार्यवाही के विरूद्ध कोई विधिक कार्यवाही, किसी हानि के लिये नहीं की जावेगी ।           

                                                                 प्रसूती पूर्व अथवा पश्चात् लिंग चयन के लिये तथा अनुवांशिक विकारों, उपापचयी  विकारों, गुणसूत्री विकारों, जन्मजात विकारों या यौन संबंधी विकारों का पता लगाने के लिये प्रसूती पूर्व परीक्षण तकनीक विनियमित करने और इनका दुरूपयोग कर लिंग पता करके कन्या भ्रूण की हत्या रोकने के लिये एवं उससे संबंधित अन्य मामलों के लिये गर्भ धारण के पूर्व, प्रसूती पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 च्छक्ज् ।बज अधिनियमित किया गया है ।


                                           इस अधिनियम के अनुसार विभिन्न तकनीकों के द्वारा प्रसूती पूर्व गर्भ परीक्षण गुण सूत्र में अनियमितता, अनुवांशिक असामान्यता , शारीरिक-मानसिक विकलांगता अथवा सेक्स संबंधी बीमारी होने पर पंजीकृत चिकित्सा संस्था में पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी को अनुमति प्रदान की गई है, जिसमें उस महिला अथवा उसके पति की परीक्षण हेतु अनुमति लिया जाना आवश्यक है । गर्भ धारण के पूर्व अथवा पश्चात् लिंग चयन के लिये उपयोग में लाई जाने वाली तकनीकों के विज्ञापन को तथा अल्ट्रासाउण्ड मशीन को अपंजीकृत व्यक्तियों  को विक्रय किये जाने पर भी प्रतिबंध लगाये गये हैं ।


            इस अधिनियम के अंतर्गत अनुवांशिक परामर्श केन्द्र, प्रयोगशाला एवं क्लीनिक विहित रूप से पंजीकृत कराये जाने अनिवार्य हैं, जिसका पंजीयन प्रमाण पत्र प्रदाय किया जाता है ।


                              किसी व्यक्ति, संगठन अथवा अनुवांशिक प्रयोगशाला, क्लीनिक आदि द्वारा  अल्ट्रासाउण्ड मशीन अथवा अन्य तकनीक से प्रसूती पूर्व लिंग निर्धारण अथवा गर्भ धारण पूर्व लिंग चयन संबंधी किसी भी प्रकार का विज्ञापन किये जाने पर तीन वर्ष तक के कारावास एवं दस हजार रूपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है ।
                          अधिनियम की धारा-23 के अंतर्गत अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर तथा लिंग ज्ञात करने के संबंध में अपराध करने पर तीन वर्ष तक के कारावास एवं  दस हजार रूपये के अर्थदण्ड से एवं पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि में पाॅंच वर्ष तक के कारावास एवं पचास हजार रूपये के अर्थदण्ड से दंडित किया जा सकता है तथा ऐसे पंजीकृत चिकित्सा व्यावसायी की दोषसिद्धि पर पाॅंच वर्ष तक पंजीकरण का निलम्बन तथा पुनरावृत्ति पर स्थाई रूप से पंजीकरण का निलम्बन किया जावेगा । किसी व्यक्ति द्वारा गर्भास्थ शिशु के अनुवांशिक विकारों के अतिरिक्त यदि किसी गर्भवर्ती महिला के लिंग चयन, प्रसूती पूर्व परीक्षण तकनीक के प्रयोग में सहायता प्रदान की जाती है तो प्रथम अपराध में तीन वर्ष तक एवं द्वितीय अपराध में पाॅंच वर्ष तक के कारावास तथा पचास हजार रूपये से एक लाख रूपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है ।

                                       अन्य दांडिक प्रावधान धारा-24 लगायत धारा-26 के अंतर्गत हैं तथा इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध संज्ञेय, अजमानतीय, अशमनीय एवं प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय होंगे, जिनका परिवाद प्रस्तुत करने पर संज्ञान लिया जा सकता है । उल्लेखनीय है कि दांडिक प्रावधान उस महिला पर लागू नहीं होंगे, जिसे ऐसी परीक्षण तकनीक या चयन के लिये मजबूर किया गया हो । साथ ही सद्भावपूर्वक किये गये कार्य के विरूद्ध भी कोई कार्यवाही नहीं की जावेगी ।

            इस प्रकार गर्भपात के संबंध में विशेषकर महिला भू्रण हत्या के संदर्भ में उपरोक्त विधि अधिनियमित है ।

                                 



विक्रय के संबध में



       निष्पादन में विक्रय

                                                                      डिक्री के निष्पादन के संबंध में किसी चल अथवा अचल संपत्ती के विकय की शक्ति सिविल प्रक्रिया संहिता (जिसे आगे संहिता से संबोधित जायेगा) की धारा 51 के खंड ’’क’’ के अनुसार निष्पादन न्यायालय को प्राप्त है। निष्पादक न्यायालय को चल अथवा अचल संपत्ती कुर्क किये जाने के पश्चात् उक्त संपत्ती का विक्रय कराया जाकर उससे प्राप्त  राशि को  ऐसे हकदार व्यक्ति को देने के आदेश की शक्ति भी प्राप्त है ।

                                                        विक्रय के संबंध में साधारणतया प्रक्रिया  संहिता के आदेश 21 नियम 64 से 73 तक में दिये गये हैं। चल संपत्ती के विक्रय के संबंध में प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 74 से 81 तक में दिये गये हैं तथा अचल (स्थावर) संपत्ती के विक्रय की प्रक्रिया आदेश 21 के नियम 82 से 96 तक में दिये गये हैं ।

                                                         विक्रय का संचालन न्यायालय के अधिकारी अथवा इस हेतु नियुक्त अन्य व्यक्ति द्वारा लोक नीलाम से किया जाता है । इसके संबंध में आदेश 21 नियम 65 से 66 है,जिसमें लोक नीलाम से विक्रय किये जाने की उदघोषणा नियम 66 के अधीन परिशिष्ट ड. के प्रारूप संख्या 28,29, एवं 30 के ,द्वारा निकाली जाती है ।

                                                         आदेश 21नियम 67 के अंतर्गत उदघोषणा नियम 54 के उप नियम दो के अंतर्गत ऐसी संपत्ती के स्थान पर डोढी पिटवाकर या अन्य रूढीगत ढंग से उदघोषित किया जावेगा और ऐसे आदेश की प्रति सहज दृष्य भाग पर लगाई जावेगी

                                                                 नियम 68 में विक्रय का समय निर्धारित किया गया है एवं नियम 69 में विक्रय के स्थगन या रोके जाने का प्रावधान है,जिसके लिए विक्रय का संचालन करने वाला अधिकारी स्थगन के कारणों को लेखवद्ध कर विक्रय स्थगित कर सकेगा। नियम 71 के अनुसार के्रता के व्यतिक्रम के कारण दोवारा नीलामी करने पर इससे हुई हानि के लिए वह उत्तरदायी होगा विक्रय के समय कुछ लोगों को बोली लगाने से प्रतिबंधित भी कियागया है ।

                                                                       नियम 72 में न्यायालय से अनुमति लेकर डिक्रीदार द्वारा ऐसी संपत्ती के लिए बोली लगाने और क्रय किये जाने का उपबंध है। यदि अनुमति के बिना यदि डिक्री दार की ओर से बोली लगाई जाय तब विक्रय आदेश अपास्त कर खर्चे डिक्रीदार के द्वारा वहन किये जावेगें । बंधकदार द्वारा न्यायालय की इजाजत के बिना बोली लगाने का उपबंध नियम 72(क) में उपबंधित है तथा विक्रय से संबंधित किसी अधिकारी या व्यक्ति को नीलाम में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बोली लगाने से नियम 73 में प्रतिबंधित किया गया है । 


   अचल संपत्ती के विक्रय के प्रावधान
       
        नियम 82 में लघुवाद न्यायालय के अलावा किसी भी न्यायालय द्वारा अचल संपत्ती का विक्रय का आदेश किया जा सकता है । नियम 83 के अंतर्गत यदि निर्णीत ऋणी न्यायालय का समाधान कर सके तो विक्रय को स्थगित किया जा सकताहै । नियम 84 के अनुसार क्रेता को नीलामी की रकम का 25 प्रतिशत तुरंत जमा कराना होगा यदि इसमें चूक हो तो पुर्नविक्रय दोबारा नीलामी द्वारा किया जा सकता है।

                                            यदि डिक्रीदार ही के्रता हो तो वह नियम 72 के अंतर्गत क्रय धन को मुजरा कर सकता है । क्रेता को क्रय धन की संपूर्ण रकम निश्चित अवधि में जमा करना होगा अन्यथा के्रता से विक्रय व्यय काटने के बाद दोवारा विक्रय किया जा सकता है। उक्त प्रावधान नियम 85,86 एवं 87 में है ।

                                                 नियम 88 के अनुसार अविभक्त अचल संपत्ती के सह अंशधारी को विक्रय मे बोली में प्राथमिकता दी जावेगी । नियम 89 के अनुसार कोई हितधारी व्यक्ति विक्रय को आपास्त करने के लिए आवेदन कर सकता है । अनियमित्ता या कपट के आधार पर विक्रय अपास्त करने के लिए आवेदन के निपटारे के लिए नियम 90 के अनुसार प्रक्रिया होगी ।

                                    नियम 91 के अनुसार के्रता यह आवेदन कर सकता है कि निर्णीत ऋणी  का विक्रय की संपत्ती पर कोई विक्रय हित नहीं था। यदि नियम 89से91के अंतर्गत कोई आवेदन नहीं किया जाता है, अथवा ऐसा आवेदन खारिज हो जाता है,तो विक्रय की पुष्टि का आदेश करेगा और विक्रय अत्यांतिक हो जावेगा,जो नियम 92 में प्रावधान है यदि विक्रय आदेश अपास्त होता है,तो उसके लिए कोई वाद नहीं लाया जा सकेगा। पंरतु अन्य पक्षकार नीलाम के्रता के विरूद्ध वाद फाईल करके निर्णीत ऋणी के हक को चुनोती दे सकते है। जहंा निर्णीत ऋणी के साथ डिक्रीदार भी पक्षकार होगा,धारा 92(2) नियम 93 में कुछ दशा में क्रय धन की वापिसी किये जाने का प्रावधान है तथा नियम 94 में अचल संपत्ती का विक्रय अंतिम हो जाने पर के्रता को प्रमाणपत्र दिये जाने का उपबंध है ।

                                          नियम 95 में निर्णीत ऋणी के अधिभोग की संपत्ती का प्रावधान तथा नियम 96 में अधिकारी के अधिभोग  की संपत्ती के परिदान का प्रावधान है ।

        आदेश 97 में  कब्जे की डिक्री के धारक या निष्पादन में विक्रय की गई संपत्ती  के के्रता को यदि कब्जा प्राप्त करने में किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिरोध किया जाता है,तो वह ऐसे प्रतिरोध का परिवाद आवेदन न्यायालय से कर सकता है । 

इस संदभर््ा में सिल्वर लाईन फोरम प्रायवेट लिमिटेड राजीव ट्रस्ट ए.आई.आर. 1998 सुप्रीम कोर्ट 1754 में यह स्पष्ट किया है,कि यदि न्यायालय को आवश्यक प्रतीत होता है तो वह उक्त आवेदन के संदभ्र्। में साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए भी कह सकता है । नियम 99 में डिक्रीदार या के्रता ,द्वारा निर्णीत ऋणी से भिन्न किसी व्यक्ति को ऐसी संपत्ती से वेकब्जा करने पर वह न्यायालय में आवेदन कर सकता  है । 

                                                 नियम 101 के अनुसार नियम 97 या 99 के अधीन आवेदन में न्यायालय कार्यवाही के पक्षकार अथवा उनके प्रतिनिधियों के बीच पैदा होने वाले और उससे सुसंगत सभी प्रश्न जिसमें संपत्ती के अधिकार का हक या हित  से संबंधित प्रश्न शामिल है का न्यायालय अवधारण करेगा । नियम 98 एवं 100 के अनुसार प्रश्नों के अवधारण करते समय न्यायालय आवेदन मंजूर कर या खारिज कर आदेश करेगा नियम 98 (2) के अनुसार जहंा न्यायालय का समाधान हो जाय कि निर्णीत ऋणी या उसकी ओर से किसी व्यक्ति ,द्वारा प्रतिरोध या बाधा डाली जा रही है,तो आवेदक के आवेदन पर 30 दिन तक निर्णीत ऋणी को सिविल कारागार में निरूद्ध रखने का आदेश भ्ंाी दे सकताहै ।

                                       नियम 103 के अंतर्गत ऐसे आदेश का प्रभाव डिक्री माना जाता है एवं वह अपीलनीय होता है। नियम 105 के अनुसार सुनवाई के लिए स्थगित तिथी को आवेदक के उपस्थित न होने पर आवेदन खारिज किया जा सकता है एवं विरोधी पक्षकार उपस्थित न होने पर एक पक्षीय आदेश किया जा सकता है। नियम 106 के अंतर्गत एक पक्षीय आदेश आदि पर्याप्त कारण होने पर अपास्त किये जा सकते है ।

                       चल संपत्ती के विक्रय की प्रक्रिया

    आदेश नियम 74 एवं 75 के अंतर्गत कृर्षि उपज तथा उगती फसलों के संबंध में उपबंधित किया गया है जिसमें ऐसे उपज का विक्रय लोक समागम के निकटतम स्थान अथवा हाट के स्थान पर किया जाता है। नियम 76 में पराक्रम्य लिख्।तो एवं निगम के अंश के विक्रय का दलाल के माध्यम से करने का प्रावधान है । चल संपत्ती का विक्रय लोक नीलाम द्वारा करतेे समय निश्चित समय में क्रय राशि जमा न करने पर उसी समय संपत्ती का पुनर्विक्रय किया जाता है । नियम 77 में नीलामी अधिकारी द्वारा क्रय राशि जमा कर लेने पर रसीद देने पर विक्रय अंतिम हो जाता है 


                                 नियम 78 के अंतर्गत यदि विक्रय के प्रकाशन या प्रक्रिया में कोई अनियमित्ता हुई हो ,तो ऐसा विक्रय दूषित नहीं होगा ,किंतु यदि ऐसी अनियमित्ता से वह व्यक्ति जिसे कोई क्षति हुई हो उस संपत्ती की वापिसी या प्रतिकर के लिए पृथक  से वाद ला सकता है । नियम 79 एवं 80 के अंतर्गत चल संपत्ती ऋणी और अंशों का परिदान के्रता को  किये जाने एवं पराक्र्राम्य लिखतों तथा अंशों का अंतरण पृष्ठांकन द्वारा किये जाने के संबंध में प्रावधन है । नियम 81 में पूर्व उपबंध से भिन्न किसी चल संपत्ती के बारे में क्रेता में उसको निहीत करने का आदेश दिया जा सकता है ।
   
        इस प्रकार सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत संपत्ती के विक्रय के संबंध में आज्ञप्ति के निष्पादन में न्यायालय द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया उपबंधित है ।

                        

विक्रय की संविदा------आधिपत्य का अनुतोष



            विक्रय की संविदा------आधिपत्य का अनुतोष

                                            विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 जिसे आगे अधिनियम से संवोधित किया गया है । इस अधिनियमकाअध्याय2,संविदााओ के विनिर्दिष्ट अनुपालन से संबंधित है । अधिनियम की धारा 9 से धारा 25 तक में संविदा के विशिष्ट अनुपालन संबंधी प्रावधान दिये हैं।

                                             अधिनियम की धारा 20 में विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री पारित करने में न्यायालय को विवेकाधिकार प्रदान किया गया है, किन्तु यह विवेकाधिकार मनमाना नहीं है, बल्कि स्वस्थ और युक्तियुक्त न्यायिक सिद्धांत द्वारा मार्गदर्शित तथा अपील न्यायालय द्वारा शुद्धिशक्य है ।

                            अधिनियम की धारा-21 में कतिपय मामलो में प्रतिकर दिलाने की शक्ति न्यायालय को प्रदान की गई है ।

                                         अधिनियम की धारा-21-1 के अनुसार किसी संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में वादी ऐसे पालन के या तो अतिरिक्त या स्थान पर उस भंग के लिए प्रतिकर का भी दावा कर सकेगा ।

                                    अधिनियम की धारा-21-2 के अनुसार यदि किसी ऐसे वाद में, न्यायालय यह विनिश्चित करे कि विनिर्दिष्ट पालन तो अनुदत्त नहीं किया जाना चाहिए किन्तु पक्षकार के मध्य ऐसी संविदा है जो प्रतिवादी द्वारा भंग की गई हो ओर प्रतिवादी उस भंग के लिये प्रतिकर पाने का हकदार है तो वह तद्नुसार वैसा प्रतिफल दिलाएगा ।

                                               अधिनियम की धारा-21-3 के अनुसार यदि किसी ऐसे वाद में, न्यायालय यह विनिश्चित करे कि विनिर्दिष्ट पालन तो अनुदत्त यिका जाना चाहिए किन्तु उस मामले में न्याय की पुष्टि के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है और संविदा के भंग के लिए वादी को कुछ प्रतिकर भी दिया जाना चाहिए तो वह तद्नुसार ऐसा प्रतिकर दिलाएगा ।

                                            अधिनियम की धारा-21-4 के अनुसार इस धारा के अधीन अधिनिर्णीत किसी प्रतिकर की रकम की अवधारणा में न्यायालयय, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 73 में विनिदिष्ट सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होगा । जो प्रकरण के तथ्य परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित किया जायेगा ।जिसमें वास्तविक क्षति प्रदान की जायेगी । दूरवर्ती अथवा काल्पनिक क्षति प्रदान नहीं की जायेगी ।

                                                        अधिनियम की धारा-21-5 के अनुसार इस धारा के अधीन कोई प्रतिकर नहीं दिलाया जावेगा तब तक कि वादी ने अपने वाद पत्र में प्रतिकर का दावा न किया हो,

                                                     परन्तु जहाॅ वाद पत्र में वादी ने किसी ऐसे प्रतिकर का दावा न किया हो वहाॅ न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में वादी को वादपत्र में ऐसे प्रतिकर का दावा अंतर्विष्ट करने के लिए वाद पत्र संशोधित करने की अनुज्ञा ऐसे निबंधनों पर देगा जैसे न्याससंगत हो ।

                                     स्पष्टीकरणः- यह परिस्थिति की संविदा विनिर्दिष्ट पालन के अयोग्य हो गई है न्यायालय को इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकारिता के प्रयोग से प्रविरत नहीं करती ।

                                                इस प्रकार अधिनियम की धारा-21 के अनुसार न्यायालय में यदि प्रतिकर का दावा न किया है तो भी प्रतिकर दिलाया जा सकता है किन्तु इसके लिए आवश्यक है कि वाद पत्र में संशोधन किया जाये । यदि वाद पत्र में प्रतिकर का दावा नहीं किया है तो न्यायालय विवेकानुसार प्रतिकर प्रदान नहीं कर सकती है। इसके लिए संशोधन होना आवश्यक है ।

                                     अधिनियम की धारा-22 न्यायालय को कब्जा विभाजन अग्रिम धन के प्रतिदाय आदि के लिए अनुतोष अनुदत्त करने की शक्ति प्रदान करती है ।

                                              अधिनियम की धारा-22-1 के अनुसार सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) किसी तत्प्रतिकूल बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी स्थावर संपत्ति के अंतरण तक संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का वाद लाने वाला कोई व्यक्ति समुचित मामले में -

क. ऐसे पालन के अतिरिक्त सम्पत्ति का कब्जा या विभाजन और प्रथम कब्जे की मांग कर सकेगा, अथवा

ख. उस दशा में जिसे कि उसका विनिर्दिष्ट पालन का दावा नामंजूर कर दिया गया हो कोई भी अन्य अनुतोष, जिसका वह हकदार हो और जिसके अंतर्गत उस द्वारा दिए गये किसी अग्रिम धन या निक्षेप का प्रतिदाय भी आता है, मांग सकेगा ।

                                             अधिनियम की धारा-22-2 के अनुसार, उपधारा एक के खण्ड (क) या खण्ड (ख) के अधीन कोई भी अनुतोष न्यायालय के द्वारा अनुदत्त नहीं किया जावेगा जब तक कि उसका विनिर्दिष्टतः दावा न किया गया हो ।

परन्तु जहाॅ कि वाद पत्र में वादी ने किसी ऐसे अनुतोष का दावा न किया हो वहाॅ न्यायालय दावे के किसी प्रक्रम में वादी को वाद पत्र में ऐसे अनुतोष का दावा अंतर्गत करने के लिए संशोधन करने की अनुज्ञा ऐसे निबंधनों पर देगा जैसे न्यायसंगत हो ।

                                               अधिनियम की धारा-22-3 के अनुसार, उपधारा एक के खण्ड (ख) के अधीन अनुतोष अनुदत्त करने की न्यायालय की शक्ति धारा 21 के अधीन प्रतिकर देने की उसकी शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी ।

                                                   अधिनियम की धारा 22 जो न्यायालय को कब्जा विभाजन अग्रिम धन की वापिसी के संबंध में अनुतोष प्रदान करने की शक्ति प्रदान करती है । उसकी धारा 22(1)(क) के अनुसार संविदा के विर्निदिष्ट अनुपालन के बाद में यदि न्यायालय समुचित मामला पाता है तो ऐसे पालन के अतिरिक्त संपत्ती का कब्जा या विभाजन और पृथक कब्जे की मांग कर सकेगा । इसके अलावा धारा 22(1)(ख) के अंतर्गत यदि विनिर्दिष्ट पालन का दावा नामंजूर किया जाता है,तो अग्रिम धन वापिसी की मांग की जा सकती है,परंतु इसके लिए आवश्यक है,कि कोई भी अनुतोष की न्यायालय से मांग की जाय और यदि मांग नहीं की गई तो वादपत्र में संशोधन की अनुमति न्यायालय से प्राप्त की जाये।

                                             अधिनियम की धारा 22(3) के अनुसार धारा 21 के अंतर्गत प्रतिकर देने की शक्तियों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पडेगा ।

                                      विनिर्दिष्ट अनुतोष के पालन में आधिपत्य का अनुतोष अधिनियम की धारा 22(क) के अंतर्गत मांगा जाना चाहिये और यदि नहीं मांगा गया है,तो न्यायालय में कब्जे का अनुतोष प्रदान कर सकता है विनिर्दिष्ट अनुतोष के अनुपालन में अनुतोष में आधिपत्य का अनुतोष शामिल रहता है तथा सामान्य रूप से स्थावर संपत्ती बिक्रय की संविदा के पालन में आधिपत्य के अनुतोष की प्रार्थना किया जाना आवश्यक है ।

यहा पर समुचित मामले से आशय जहंा अनुतोष दावे या डिक्री से विनिर्दिष्ट अनुतोष के परिपालन की पूर्ति नहीं हो वहंा वादी विर्निदिष्ट अनुतोष के साथ विशिष्ट रूप से कब्जा की मांग कर सकता है । धारा 22 का मुख्य उददेश्य वाद की बाहुल्यता रोकना है । यह धारा भूतलक्षी प्रभाव रखती है ।

यह धारा संपत्ती अंतरण अधिनियम की धारा 55(1)(एफ) से मेल खाती है । यदि डिक्री में आधिपत्य की बात नहीं लिखी गई है,तो भी निष्पादन न्यायालय डिक्री धारी को कब्जा प्रदान कर सकता है,क्योंकि डिक्री में आधिपत्य शामिल है ।

संपत्ती अंतरण अधिनियम की धारा 55(1)(एफ) में क्रेता एवं विक्रेता के अधिकारों और दायित्व दिये गये हैं । जिसके अनुसार अपेक्षा किये जाने पर विक्रेता आबद्ध है कि के्रता या उसके द्वारा विनिर्दिष्ट व्यक्ति को उस संपत्ती पर ऐसा कब्जा देय जैसा संपत्ती की प्रकृति के अनुसार दिया जा सकता हो । इसी आधारभूत नियम के आधार पर अधिनियम की धारा 22में न मांगने पर भी कब्जा न्यायालय द्वारा दिलाया जावेगा ।

                                                        माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बाबूलाल वि0 मेसर्स हजारीलाल, किशोरीलाल ए.आई.आर.1982 सुप्रीम कोर्ट 818 में स्पष्ट प्रतिपादित किया है । जहंा संविदा के तहत जिस पक्ष के पास वादग्रस्त संपत्ती का अनन्य कब्जा है वहंा विनिर्दिष्ट रूप से आधिपत्य प्रदान किये जाने के अनुतोष की याचना किये बिना मात्र विक्रय की संविदा का विनिर्दिष्ट अनुपालन डिक्रीधारी को पूर्ण एवं प्रभावी अनुतोष प्रदान कर सकता है । र्निणीत ऋणी की पूर्णता संतुष्टी हेतु न केवल विक्रयपत्र संपादित करने,बल्कि संपत्ती का आधिपत्य प्रदान करने हेतु आबद्ध है।

                                     विक्रय की संविदा के विर्निदिष्ट अनुपालन के सभी मामलों में आधिपत्य के अनुतोष की याचना करना आवश्यक नहीं है । उपर्युक्त धारा 22 में पद ’’समुचित मामला ’’ का प्रयोग किया गयाहै । यह पद स्पष्ट करता है,कि प्रत्येक मामले में यह आवश्यक नहीं है,कि वादी विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के साथ साथ आधिपत्य प्राप्ति का विनिर्दिष्ट रूप से दावा करे। आधिपत्य प्रदान किया जाना बिक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के अनुतोष में ही अंर्तनिहीत है ।

                                           अधिनियम की धारा 22(2) में निष्पादन कार्यवाही शामिल है । कब्जे के साथ विभाजन की डिक्री नहीं दी जा सकती है । सबसे पहले विक्रय करार की पूर्ति में दावा डिक्री किया जाना चाहिये इसके पश्चात् विक्रय पत्र का पंजीयन होना चाहिये इसके बाद ही बिभाजन की डिक्री के लिए कार्यवाही की जा सकती है ।

                                           इसी प्रकार यदि तीसरे पक्ष के पास कब्जा है,तो सबसे पहले डिक्री के निष्पादन में आदेश 21 नियम 97 सपठित धारा 47 सी.पी.सी. के अंतर्गत तृतीय पक्षकार को आपत्ती प्रस्तुत करना चाहिये वह अलग से दावा नहीं कर सकता उसकी आपत्ती सुनने के पश्चात् ही तृतीय पक्ष से कब्जा दिलाया जा सकता है । यह सिद्धात ’’ए.आई.आर.1995,358, भंवरलाल वि0सत्य नारायण 1983 एम.पी.एल.जे. 527,बाटा शू कंपनी वि0 प्रीतमदास ’’अभिनिर्धारित किया गया है ।

                                                        बाबूलाल वि0 राजकुमार ए.आई.आर. 1996 सुप्रीम कोर्ट 2050 में भी यह भी अभिर्निधारित किया है,कि विनिर्दिष्ट अधिनियम की डिक्री में कब्जा देते हुये यदि तृतीय पक्ष के पास कब्जा है,तो उसे सुना जाना आवश्यक है उसे सुने बिना तृतीय पक्ष को कब्जा नहीं दिलाया जा सकता । यदि तृतीय पक्षकार को सुना नहीं जाता है,तो इस प्रकार की कार्यवाही उचित नहीं है । ऐसे मामले में न्यायालय स्व विवेक में कब्जा नहीं दिला सकती है यह मामला समुचित मामला नहीं माना जायेगा ।

                                             माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ए.आई.आर. 2006, सुप्रीम कोर्ट 145 टी.सी.वर्गिस वि. देवकी अम्मा,बाला अंबिकादेवी एवंए.आई.आर.2011,पंजाब हरियाणा ,30 लाबिन्दर कुमार शर्मा वि0 प्रमोद कुमार के मामले में अभिनिर्धारित किया है,कि संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के वाद में वैकल्पिक अनुतोष विभाजन अग्रिम धन वापिसी आदि सहायता चाहे जाने के लिए इनका विशेष रूप से अभ्।िबचन किया जाना आवश्यक है ।

                                          न्यायालय केबल समुचित मामले में कब्जे का अनुतोष प्रदान कर सकता है । समुचित मामला ऐसा मामला माना जा सकता है जिसमें मूल अनुतोष के साथ पारिणामिक अनुतोष जुडा होता है और बिना पारिणामिक अनुतोष के मूल अनुतोष प्रदान नहीं किया जा सकता । विक्रय संविदा का वाद इसी प्रकार का वाद है,जिसमें संपत्ती अंतरण अधिनियम की धारा 55 के अनुसार विके्रता को के्रता से कब्जा प्रदान कराना अनिवार्य है ।